37 साल बाद फिर चारों सदनों में शून्य होगी बसपा? इकलौते विधायक उमाशंकर सिंह के निधन से खत्म हुआ विधानसभा प्रतिनिधित्व, नवंबर में राज्यसभा सीट भी होगी खाली
बहुजन समाज पार्टी (बसपा) अपनी स्थापना के करीब 37 साल बाद देश के चारों सदनों में ‘शून्य’ प्रतिनिधित्व की स्थिति में पहुंच सकती है। उत्तर प्रदेश विधानसभा में पार्टी के इकलौते विधायक उमाशंकर सिंह का 5 अगस्त को निधन हो गया। वहीं, यूपी विधान परिषद में भी बसपा का कोई सदस्य नहीं है।
2024 में पार्टी के एकमात्र विधान परिषद सदस्य (MLC) भीमराव अंबेडकर का कार्यकाल पूरा होने के बाद बसपा उच्च सदन में वापसी नहीं कर सकी। इसी साल हुए लोकसभा चुनाव में भी पार्टी एक भी सीट जीतने में सफल नहीं रही।
अब राज्यसभा में बसपा के पास केवल रामजी गौतम हैं। उनका कार्यकाल 25 नवंबर 2026 को समाप्त होने वाला है। यदि इससे पहले पार्टी को कोई नई सीट नहीं मिलती है, तो इसके बाद लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभा और विधान परिषद—चारों सदनों में बसपा का कोई निर्वाचित सदस्य नहीं रहेगा।

बसपा के कमजोर होने की 3 बड़ी वजहें
1. कोर वोटबैंक में सेंध
वरिष्ठ पत्रकार रतनमणि लाल के मुताबिक, 2024 के लोकसभा चुनाव में बसपा का पारंपरिक जाटव वोटबैंक भी पार्टी से दूर होता दिखाई दिया। वहीं, गैर-जाटव दलित और ओबीसी मतदाताओं का एक वर्ग पहले ही बसपा से दूरी बना चुका है।
2. जमीनी स्तर पर संगठन की निष्क्रियता
बसपा के पूर्व नेता और सपा सांसद लालजी वर्मा का कहना है कि कांशीराम के दौर जैसी कैडर आधारित राजनीति अब पार्टी में नजर नहीं आती। उनके मुताबिक, संगठन की सक्रियता मुख्य रूप से चुनाव के समय ही दिखाई देती है।
3. पुराने नेताओं का पार्टी से मोहभंग
पार्टी के कई पुराने और प्रभावशाली नेताओं के बाहर जाने से बसपा के संगठनात्मक ढांचे को भी झटका लगा है। बसपा के पूर्व नेता और सपा सांसद बाबू सिंह कुशवाहा का आरोप है कि मायावती अपने से बड़ी राजनीतिक पहचान वाले किसी नेता को उभरने नहीं देना चाहतीं। उनके अनुसार, पार्टी में नेतृत्व को लेकर एक तरह की असुरक्षा की भावना दिखाई देती है।